मैं मॉरीशस का गन्ना हूँ…

मॉरीशस से सविता तिवारी

मैं गन्ना हूं, मॉरीशस का गन्ना, मॉरीशस का सबसे बुजुर्ग नागरिक हूँ मेरी उम्र तीन सौ वर्ष से कुछ अधिक ही है. मुझे मॉरीशस डच लाए थे, 1639 में, बड़ी नाव के अंधेरे कमरे में जब मुझे लादा गया तब मुझे मेरी मंजिल पता नहीं थी,ना ही यह पता था कि वहां भविष्य में भारतीय आएंगे और मेरी सेवा करेंगे, पर आज मुझे बहुत कुछ पता है। पहले मैं 52 हजार हेक्टर में जोतकर डेढ़ लाख टन चीनी बनाता था, फिर मैंने वह दिन भी देखे जब 72 हजार हेक्टर में मैंने छह लाख टन से अधिक चीनी या उत्पादन किया,लोग कहते थे मेरे कारण मॉरीशस में समृद्धि आई और मैं मारे खुशी के और मीठा हो जाता लेकिन अब साल दर साल मेरे उत्पादन में कमी आ रही है और मेरी इस टापू पर उपस्थिति भी सिमटती जा रही है.
पहले में टापू भर में यात्रा करने वालों के सफर का साथी रहता था. लेकिन अब इस साथ में लम्बे लम्बे ब्रेक आ रहे हैं. कई-कई किलोमीटर तक साथ छूट जाता है. फिर दूर किसी छोर पर जाकर मिल भी जाते हैं. पर मैं सिमट रहा हूं. दूर हो रहा हूं इस धरती से,कभी मॉरीशस की रीढ़ कहे जाने वाला गन्ना अब खेतों से गायब हो रहा है. मैं वही गन्ना हूं जिसने भारतीयों को मॉरीशस पहुंचाया और इसी की खेती से भारतीयों ने मजदूर से महामहीम तक की यात्रा तय की, मुझे बचाने की बहुत सारी योजनाएं चल रही है पता नहीं लक्ष्मी के प्रिय और समृद्धि के प्रतीक गन्ने की समृद्धि कब आएगी. इक्षुदण्ड धारण करने वाली मां ललिता कब मुझ पर अपनी कृपा बरसाएगी और मैं पुनः जी ऊठुंगा. इतिहासकार कहते हैं, 300 साल पहले, पहली बार रोपा गया गन्ना मॉरीशस की समृद्धी का मेरुदण्ड है. इसी की सेवा कर भारतीय मजदूर समृद्ध हुए. पर आज हालात यह है कि गन्ना खेतीहरों के नुकसान के कारण सरकार को लोन माफ करने पड़ रहे हैं. सब्सिडी देनी पड़ रही है. गन्ने के हालात मेरे देखते देखते ही बहुत बदल गए हैं.

बस इतनी ही कहानी है मेरी. कभी हाथों से रोपा जाता था, सींचा जाता था और प्रेम से कटाई भी की जाती थी. फसल के गीत गाते हुए. आज मशीनें ही सारा काम कर देती है. इंसानों से सुबह से शाम तक का नाता छूट गया. बुजुर्गों की बातें छूट गई और बच्चों का गन्नें की गलियों में दौड़ना-खेलना छूट गया. गन्ना अकेला रह गया.

बस एक सरकार है जो नित नई घोषणाओं से गन्ना उद्योग को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है. एक संस्था है जो शोध कर रही है कि इसका उत्पादन कैसे बढ़े. और एक मैं हूं, स्वंय गन्ना, मुझसे कोई नहीं पूछता. मेरी हालत घर के उस बुजुर्ग जैसी हो गई है जो कहने को तो मुखिया है, पूरी दुनिया उसी के नाम से घर को पहचानती है पर घर में अब उसकी चलती नहीं. मुझे पसीने से सींचते लोग चाहिए. मुझसे बातें करने वाले इंसान चाहिए.

जमीन भी वही है, आसमान भी वही है, मॉरीशस की गलियां भी वही है, पर अब मैं वही गन्ना नही रहा. लोग बदल गए हैं और मैं भी बदल गया हूं. मेरी आत्मा मुझे छोड़ चुकी है अब मैं सिर्फ शोध के सहारे जीवित हूं. पेस्टिसाइड मेरी सांसे चला रही है. मैं जा रहा हूं. धीरे धीरे जा रहा हूं यहां से. अब सब छूट रहा है. मैं जी उठुं लेकिन किसके लिए. वे प्रेम से सींचने वाले हाथ अब नहीं मिलेंगे. आज भी चाहता हूं कोई आवाज देकर रोक ले. वही प्यार भरे गीत गाकर कटाई कर दे. पर अब चले जाने में ही सुख है. किसी के दुख का कारण ना बनू इसी में संतोष है.

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