भारत राजसत्ता से संचालित समाज नहीं है

के.एन. गोविन्दाचार्य

स्तम्भ: भारत यूरोप की तरह शर्तों पर आधारित (SOCIAL CONTRACT THEORY) समाज नही है। भारत संबंधो, पारिवारिक भावना और सर्वात्मैक्य के भाव से बुना हुआ समाज है। इसके व्यक्तित्व की धुरी भगवद् सत्ता है और संचालन की धुरी धर्मसत्ता है। विचार, वाणी नहीं “जीवन ठीक प्रकार से जी लेना है” भारत में महत्वपूर्ण है।

कांची के शंकराचार्य रहे महास्वामी श्री चन्द्रशेखररेन्द्र सरस्वती, अभी के शंकाराचार्य जी के दादा गुरु (20 मई 1894 – 8 जनवरी 1994) का कहना था कि धर्मसत्ता के लोगों को दो तत्वों को साधना चाहिये एक अपरिग्रह, दूसरा निरहंभावना। और ऐसा वे ऐसे स्वयं जी गये।

1948-49 में रा.स्व.संघ पर गांधी ह्त्या का झूठा आरोप तत्कालीन केन्द्रीय सरकार द्वारा लगाया गया था। शंकराचार्य जी ने ही जस्टिस वेंकटरामशास्त्री, ताताचार्य सरीखे लोगों को दिल्ली भेजा। उन्होंने कहा कि देखो- एक प्रमुख हिन्दू संगठन को प्रतिबंधित किया गया है और एक श्रेष्ठ योगी (प.पू. श्री गुरूजी) को काराबद्ध किया गया है। उन्हें मुक्त करने मे लग जाओ। वैसा हुआ भी। भारत के आकाश मे ऐसे महापुरुषों का पंक्ति चाँद सितारों के रूप में फैली हुई है। महास्वामी महाराज के समान विभूतिमत्व वाले लोग जी गये और एक दीप से जले दूसरे को चरितार्थ कर गये।

पिछले दिनों नेपाल स्थित श्री भगवत् ढकाल जी द्वारा पता चला कि वे भी मेरे पिताश्री स्व. श्री नीलमेघाचार्य जी के संपर्क मे आये और श्रीभाष्य का अध्ययन किया। ऐसे ही अयोध्या, चित्रकूट के अनेक सन्त मुझे मिले जिन्होने कहा कि वे पिताजी से पढ़े है। मेरे पूज्य पिताश्री 1945 से स्थिर रूप से काशी में रहकर अध्ययन – अध्यापन मे ही लगे रहे। पिताजी का यह सिलसिला प्रति 4:30 बजे से शुरू हो जाता था रात्रि 9 बजे तक चलता था! उसी बीच नीचीबाग़ स्थित “रामानुज संस्कृत महाविद्यालय” बाद में 1960 से 1964 वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में भी पढ़ाकर घर लौट आते थे। वे विद्याव्यसनी थे। 1964 में वे वैकुण्ठवासी हुए।

पेजावर स्वामी श्री विश्वेशतीर्थ जी महाराज ने मुझे बताया था कि काशी में अद्वैतमत और द्वैत मत के विद्वानों मे शास्त्रार्थ हुआ था। जिसमे द्वैत मत की ओर से विश्वेश तीर्थ जी थे। उसमे पिताश्री प. नीलमेघाचार्य ज़ी ने मध्यस्थता की थी। प. नीलमेघाचार्य का श्री संप्रदाय के सभी सैद्धांतिक ग्रंथो पर पूर्ण अधिकार था। लगभग सन् 51-52 की बात है। गुजरात के धर्मचक्रोदय मठ, डभोई हीराभगोल से एक पीठाधीश्वर पिताजी से मिलने कशी मे घर पर आये थे। उन्होंने पिताश्री से एक निवेदन किया।

उन्होने कहा कि महाराज जी! आपके चार पुत्र है। इनमें से एक को मुझे दे दीजिये। मेरे मठ के कीर्तिवर्धन के पुण्यकार्य में वह संचालन करेगा। पिताश्री ने उत्तर दिया कि आपका सुझाव विचार योग्य है पर स्वीकार योग्य नही है। असल मे चारों से बड़ा एक और पुत्र है। यही मेरे घर पर ही रहकर अध्ययनरत है। ज्यादा योग्य है इसे ले जाइये। आपके स्थान की पुण्याई बढायेगा अपनी तपस्या से और वीतरागी जीवन से।

उन्होंने पिताजी की बात मान ली और उस बड़े पुत्र श्री भागवतम् बाद मे उनका नाम उभय वेदान्ताचार्य स्वामी अनिरुद्धाचार्य जी महाराज हुआ, को वे ले गये। कालक्रम मे वे पीठाधीश बने। बनते ही ट्रस्ट के लोगों को एकत्रित बुलाकर उन्होंने निर्देश दिया कि वे स्वयं मठ संपत्ति आदि को चलाने मे रूचि नही रखते। ट्रस्ट के लोगों को वे संचालन का पूर्ण अधिकार देते हैं।

स्वामीजी ने कहा कि उन्हें तो एक समय का भोजन करना है। दो कंबल, दो धोती सरीखी जरूरते हैं। उन्हें चढ़ावा जो मिलेगा उससे न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हो जायेगी। शेष राशि भी ट्रस्ट के लोग ले लें।

जीवन उन्होंने ऐसा ही चलाया और शिष्यों, भक्तों को सही जीवन जीने की ओर प्रवृत्त किया।
भारत मे ऐसे उदाहरण हर जिले, तहसील ग्राम मे मिल जायेंगे, यही भारत की ताकत है जो सिखाती है कि पतवार चलाते जायेंगे, मंजिल आयेगी, आयेगी।

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